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आयुर्वेद मानव जीवन के लिए संजीवनी है लेकिन आज इसको व्यवसाय बना दिया गया है।

समाज में आयुर्वेद यूनानी हौम्योपैथ की धारणा बन जाना स्वाभाविक ही है, क्योंकि अक्सर देखा गया है इन चिकित्सा प्रणालियों का प्रचार- प्रसार भी जोर- शोर से होता है- ‘चमत्कार। अनोखी खोज। अमुक (असाध्य) रोग तीन पुडिय़ा में साफ… बगैर ऑपरेशन, शर्तिया इलाज, महीने भर का कोर्स डाक से मंगाएं।’ यानी बीमारी मरीज खुद तय कर ले और बिना परीक्षण के इलाज भी ले ऐसा वातावरण कतिपय चिकित्सकों और दवा निर्माता कंपनियों ने निर्मित कर दिया है। इस संदर्भ में कई प्रश्न उठते हैं:
1.क्या आयुर्वेद कोई चलताऊ इलाज है, जो रोगी को बिना देखे- परखे रास्ते चलते बताया जा सकता है?
2.क्या किसी भी एक बीमारी में एक दवा या पुडिय़ा ही होती है?
3.क्या बरसों पुरानी असाध्य बीमारी या शल्य साध्य बीमारी भी सामान्य इलाज से दूर हो सकती है?
इन प्रश्नों का उत्तर आयुर्वेद में ही मिलेगा और वह उत्तर है- नहीं, कदापि नहीं।
चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, अष्टांग हृदय।

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