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यह चूर्ण लाइलाज अस्थमा (दमा) को जड़ से ठीक करता है, आज़माएँ और शेयर करे

  • सांस लेने में दिक्कत या कठिनाई महसूस होने को श्वास रोग कहते हैं। इस रोग की अवस्था में रोगी को सांस बाहर छोड़ते समय जोर लगाना पड़ता है। इस रोग में कभी-कभी श्वांस क्रिया चलते-चलते अचानक रुक जाती है जिसे श्वासावरोध या दम घुटना कहते हैं। श्वांस रोग और दमा रोग दोनों अलग-अलग होते हैं। फेफड़ों की नलियों की छोटी-छोटी तंतुओं (पेशियों) में जब अकड़नयुक्त संकोचन उत्पन्न होता है तो फेफड़ा सांस द्वारा लिए गए वायु (श्वास) को पूरी अन्दर पचा नहीं पाता है जिससे रोगी को पूरा श्वास खींचे बिना ही श्वास छोड़ने को मजबूर हो जाता है। इसी स्थिति को दमा या श्वास रोग कहते हैं।
  • आज के समय में दमा (अस्थमा) तेजी से स्त्री-पुरुष व बच्चों को अपना शिकार बना रहा है। यह रोग धुंआ, धूल, दूषित गैस आदि जब लोगों के शरीर में पहुंचती है तो यह शरीर के फेफड़ों को सबसे अधिक हानि पहुंचाती है। प्रदूषित वातावरण में अधिक रहने से श्वास रोग (अस्थमा) की उत्पत्ति होती है। अधिक दिनों से दूषित व बासी ठंड़े खाद्य पदार्थों का सेवन करने और प्रदूषित वातावरण में रहने से दमा (अस्थमा) रोग होता है। कुछ बच्चों में दमा रोग वंशानुगत भी होता है। माता-पिता में किसी एक को दमा (अस्थमा) होने पर उनकी संतान को भी (अस्थमा) रोग हो सकता है। वर्षा ऋतु में दमा रोग अधिक होता है क्योंकि इस मौसम में वातावरण में अधिक नमी (आर्द्रता) होती है। ऐसे वातावरण में दमा (अस्थमा) के रोगी को श्वास लेने में अधिक कठिनाई होती है और रोगी को दमा के दौरे पड़ने की संभावना रहती है। दमा के दौरे पड़ने पर रोगी को घुटन होने लगती है और कभी-कभी दौरे के कारण बेहोश भी होकर गिर पड़ता है।
  • आज पूरी दुनिया प्रदूषण के कारण त्रस्त है।दुनिया भर में जहां वायु प्रदूषण सबसे विकट समस्या है वही ध्वनि प्रदूषण भी एक विकट समस्या है।ध्वनि प्रदूषण से कुछ हद तक निजात पाया जा सकता है लेकिन वायु प्रदूषण धीरे धीरे हमारे शरीर मे कार्बन डि  ऑक्साइड को इकट्ठा कर फेफड़े की कार्यक्षमता को क्षीण कर देता है। चूंकि बढ़ती आबादी ओर बढ़ते कल कारखाने गाडियो का धुआं इसको ओर बढ़ावा देते है फेफड़े में रोजाना नया जमावड़ा कार्बन का हो रहा है।यदि दांत की तरह साफ किया जा सकता तो लोग इसको रोजाना साफ कर लेते लेकिन ये संभव नही है।
  • वर्तमान के इस आधुनिक युग में सभी उम्र के लोग श्वास की बीमारी से ग्रस्त हो रहे है। ऐसे लोगो को श्वास फूलना, दम का बार बार उठना, खांसी कफ सहित या कफ रहित, मौसम बदलने पर श्वसन का संक्रमण होंना,  श्वास लेने पर पसलियों में दर्द होना, नजला, एलर्जी होना जैसे लक्षण दिखाई देते है। कुछ रोगियो में बचपन मे टि.बी. या बार बार न्यूमोनिया होने के कारण भी श्वशन रोग हो जाता।

दमा या अस्थमा (Asthma) होने का कारण :

  1. श्वास रोग एक एलर्जिक तथा जटिल बीमारी है जो ज्यादातर श्वांस नलिका में धूल के कण जम जाने के कारण या श्वास नली में ठंड़ लग जाने के कारण होती है।
  2. दमा रोग जलन पैदा करने वाले पदार्थों का सेवन करने, देर से हजम होने वाले पदार्थों का सेवन करने, रसवाहिनी शिराओं को रोकने वाले तथा दस्त रोकने वाले पदार्थों के सेवन करने के कारण होता है। यह रोग ठंड़े पदार्थों अथवा ठंड़ा पानी अधिक सेवन करने, अधिक हवा लगने, अधिक परिश्रम करने, भारी बोझ उठाने, मूत्र का वेग रोकने, अधिक उपश्वास तथा धूल, धुंआ आदि के मुंह में जाने के कारणों से श्वास रोग उत्पन्न होता है।
  3. अधिक दिनों से दूषित व बासी ठंड़े खाद्य पदार्थों का सेवन करने और प्रदूषित वातावरण में रहने से दमा (अस्थमा) रोग होता है। कुछ बच्चों में दमा रोग वंशानुगत भी होता है। माता-पिता में किसी एक को दमा (अस्थमा) होने पर उनकी संतान को भी (अस्थमा) रोग हो सकता है।
  4. वर्षा ऋतु में दमा रोग अधिक होता है क्योंकि इस मौसम में वातावरण में अधिक नमी (आर्द्रता) होती है। ऐसे वातावरण में दमा (अस्थमा) के रोगी को श्वास लेने में अधिक कठिनाई होती है और रोगी को दमा के दौरे पड़ने की संभावना रहती है। दमा के दौरे पड़ने पर रोगी को घुटन होने लगती है और कभी-कभी दौरे के कारण बेहोश भी होकर गिर पड़ता है।

दमा या अस्थमा (Asthma) होने के लक्षण :

  1. क्षुद्रश्वांस : रूखे पदार्थों का सेवन करने तथा अधिक परिश्रम करने के कारण जब कुछ वायु ऊपर की और उठती है तो क्षुद्रश्वांस उत्पन्न होती है। क्षुद्रश्वांस में वायु कुपित होती है परन्तु अधिक कष्ट नहीं होता है। यह रोग कभी-कभी स्वत: ही ठीक हो जाता है।
  2. तमस श्वांस (पीनस) : इस दमा रोग में वायु गले को जकड़ लेती है और गले में जमा कफ ऊपर की ओर उठकर श्वांस नली में विपरीत दिशा में चढ़ता है जिसे तमस ( पीनस ) रोग उत्पन्न होता है। पीनस होने पर गले में घड़घड़ाहट की आवाज के साथ सांस लेने व छोड़ने पर अधिक पीड़ा होती है। इस रोग में भय , भ्रम , खांसी , कष्ट के साथ कफ का निकलना, बोलने में कष्ट होना, अनिद्रा (नींद न आना) आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। सिर दर्द , मुख का सूख जाना और चेतना का कम होना इस रोग के लक्षण हैं। यह रोग वर्षा में भीगने या ठंड़ लगने से भी हो जाता है। पीनस रोग में लेटने पर कष्ट तथा बैठने में आराम का अनुभव होता है।
  3. ऊध्र्वश्वास (सांस को जोर से ऊपर की ओर खिंचना) : ऊपर की ओर जोर से सांस खींचना, नीचे को लौटते समय कठिनाई का होना, सांसनली में कफ का भर जाना, ऊपर की ओर दृष्टि का रहना, घबराहट महसूस करना, हमेशा इधर-उधर देखते रहना तथा नीचे की ओर सांस रुकने के साथ बेहोशी उत्पन्न होना आदि लक्षण होते हैं।
  4. महाश्वांस : सांस ऊपर की ओर अटका महसूस होना, खांसने में अधिक कष्ट होना, उच्च श्वांस, स्मरणशक्ति का कम होना, मुंह व आंखों का खुला रहना, मल-मूत्र की रुकावट, बोलने में कठिनाई तथा सांस लेने व छोड़ते समय गले से घड़घड़ाहट की आवाज आना आदि इस रोग के लक्षण हैं। जोर-जोर से सांस लेना, आंखों का फट सा जाना और जीभ का तुतलाना -ये महाश्वास के लक्षण हैं।
  5. छिन्न श्वांस : इस रोग में रोगी ठीक प्रकार से श्वांस नहीं ले पाता, सांस रुक-रुककर चलती है, पेट फूला रहता है, पेडू में जलन होती है, पसीना अधिक मात्रा में आता, आंखों में पानी रहता है तथा घूमना व श्वांस लेने में कष्ट होता है। इस रोग में मुंह व आंखे लाल हो जाती हैं, चेहरा सूख जाता है, मन उत्तेजित रहता है और बोलने में परेशानी होती है। रोगी की मूत्राशय में बहुत जलन होती है और रोगी हांफता हुआ बड़बड़ाता रहता है।

आवश्यक सामग्री :

  1. कंटकारी, 
  2. अडूसा,
  3. भारंगी,
  4. सोमलता,
  5. हल्दी,
  6. तुलसी,
  7. अमृतासत्व,
  8. सौंठ,
  9. यष्टिमधु ,
  10. अजमोद,
  11. जुफ़ा ईरानी।

औषधि बनाने और सेवन का तरिका :

  • अस्थमा से पीड़ित व्यक्ति प्रायः पंप गोलियां या स्टेरॉयड लेते है और अंत मे इन दवाइयों के सेवन से फेफड़ा कड़क हो जाता है।फेफड़े की क्षमता ऑक्सिजन लेने की कम हो जाती है। इस रोग का जड़ से ठीक करने के लिए ऊपर लिखी सभी 11 जड़ी बूटियां अपने निकट किसी पंसारी की दुकान से लावे इन्हें धूप में रखकर सुखाए फिर पीस कर मलमल के कपड़े से छानकर लगभग पोन्न चम्मच (3/4) डेढ़ चम्मच शहद में लेप बनाकर धीरे धीरे जीभ पर चाटें।
  • इस जड़ी बूटियों के मिश्रण में किसी भी उम्र या किसी प्रकार लाइलाज दमे को ठीक करने की शक्ति है इसमें निहित ईरानी जुफ़ा शरीर के किसी भी हिस्से में जमा कफ को एकत्रित कर मल द्वारा शरीर से बाहर निकालने की क्षमता रखता है। सर्दियों में प्रायः हर घर मे कफ सिरप की आवश्यक्ता होती है।इस मिश्रण का 6 चम्मच 300gm साफ पानी मे मंदी आंच पर गर्म करें जब आधा पानी उड़ जाए तब ठंडा करके कांच की बोतल में रख लेवे बाजार में उपलब्ध किसी भी कफ सिरुप से ये कई गुना जज़्यादा और बढ़िया काम करता है। कुछ बच्चों में बचपन से दमे की बीमारी होती है जिसको चाइल्ड अस्थमा कहते है उसमें भी यह लाभप्रद है।

ज़रूरी सावधानी :

  • दमा से बचने के लिए पेट को साफ रखना चाहिए। कब्ज नहीं होने देना चाहिए। ठंड से बचे रहे। देर से पचने वाली गरिष्ठ चीजों का सेवन न करें। शाम का भोजन सूर्यास्त से पहले, शीघ्र पचने वाला तथा कम मात्रा में लेना चाहिए। गर्म पानी पिएं। शुद्ध हवा में घूमने जाएं। धूम्रपान न करें क्योंकि इसके धुएं से दौरा पड़ सकता है। प्रदूषण से दूर रहे खासतौर से औद्योगिक धुंए से। धूल-धुंए की एलर्जी, सर्दी एवं वायरस से बचे। मनोविकार, तनाव, कीटनाशक दवाओं, रंग-रोगन और लकड़ी के बुरादे से बचे। मूंगफली, चाकलेट से परहेज करना चाहिए। फास्टफूड का सेवन नहीं करना चाहिए। अपने वजन को कम करें और नियमित रूप से योगाभ्यास एवं कसरत करना चाहिए। बिस्तर पर पूर्ण आराम एवं मुंह के द्वारा धीरे-धीरे सांस लेना चाहिए। नियमपूर्वक कुछ महीनों तक लगातार भोजन करने से दमा नष्ट हो जाता है।

आवश्यक परहेज :

  • अचार, दही, केला, निम्बू, संतरा, आइसक्रीम, चाय, गुड़, अधिक तेल और मसालो का खाना बंद कर दे।
  • नोट : ऊपर लिखी सभी जड़ी-बूटियाँ आप अपने नजदीकी जड़ी-बूटि की दुकान से खरीद सकते है। यदि आपको यह जड़ी-बूटि उपलब्ध नही हो पाये तो इन का बना बनाया अस्थमा नाशक चूर्ण हम आपको उपलब्ध करवा सकते है। संपर्क सूत्र – Dr. R. K. Kochar Call & Whatsapp :+919352950999

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